उन्मनी वाङमय

हस्ताहस्तांत अर्पूं श्रीफल!। संकल्पावधूत कार्य हे! ।।

११-२-३९

 

लता ही रूजेल वनावनांत।

स्फूर्ति ही स्फुरेल मनामनांत। 

विद्या ही खुलेल जनाजनांत।

`अन्नदा` श्रीभास्वरा!           ।।१।।

   

देहादेहास करू सालँकृत।

गूढा गूढास करू आविष्कृत।

मूढा मूढास अन् शुक्लाध्यस्त।

संवित् शलाकेनें! ।।            ।।२।।

   

लहरी लहरीवरी दाखवूं तळमौक्तिकें।

शीर्षशीर्ष सिंचवूं आशीर् अभिषेकें।

जीवजीव सुखवूं सोंलीव सुखें।

कैवल्यस्पर्श हा प्रबोधक! ।।           ।।३।।

   

हस्ताहस्तांत अर्पूं श्रीफल!।

कंठाकंठांत वोपूं कैवल्यजल!  ।

वक्षीं वक्षीं स्थापूं सौभाग्य श्रियाळ!।

संकल्पावधूत कार्य हे! ।।      ।।४।।

   

नेत्रानेत्राशीं भिडवूं सूर्यबिंब!।

गात्रागात्रासी कल्पवूं चंद्रिकासंग।

श्रोत्राश्रोत्रास श्राववूं आदेश अभंग।

अलख्पुरीचे `श्रीमंत' आम्ही!।।        ।।५।।

   

गृहागृहांत पेटवू महादीप।

भ्रष्टाभ्रष्टास ऐकवूं उ:शाप!।

शवाशवावरी महाचैतन्याचा अध्यारोप।

करीत राहूं संकर्मवेत्ते।।          ।।६।।

   

अणूं -अणूंत प्रसूतवूं चितिकोर।

बिंदू बिंदूंत प्रकटवूं मत्स्य विद्यासागर।

लोमलोमीं उमटवूं श्रीसंवित्संस्कार।

सहजा ही आमुची प्रवृत्ती!  ।।          ।।७।।

 

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