उन्मनी वाङमय

११ ऑगस्ट १९४१

११ ऑगस्ट

एकूण श्लोक: ०६

 

संध्याकाळी ०६.२५

 

शास्त्र आमुचें ‘संयुद्वाम’।

उकिरड्यांत आमुचें धाम।

चितितेज आमुचें घन:श्याम।

चिमुटरक्षेंत अष्टावसू!  ।।          ।।१।।    

 

माझ्या नि:शब्दी उमटल्या श्रुती।

आणि समाधिभावांत प्रस्फुरल्या कृती।

लत्ता प्रहारीं आमुच्या प्रणती।

मृत्यूंत देखा महाजीवन!।।          ।।२।।    

 

संध्याकाळी ०६.३०

 

तारक झुंबरलें उफराट्या नभीं।

जातमात्र पुन:प्रवेशलें मातृगर्भीं।

सिद्धि प्रसाद प्रकटला कीं प्रारंभी।

मूळासि पळ लागलें! ।।            ।।३।।    

 

संध्याकाळी ०६.४९

 

स्मशानीं टांगले नवजातांचे पाळणे।

श्रवणांतून उद्भवले लोकनाथांचें ‘गोविंद’ गाणें।

आदिमाऊलीनें दिलें कीं आज बाळलेणें।

सिद्धबीजा मंत्रमूर्ती! ।।            ।।४।।    

 

संध्याकाळी ०७.००

 

फेसाळले सहस्रवीचीचे कल्लोळ। 

उफाळले दहराकाशीचे महातेजोगोल।

सन्मुखले समाधिसौभाग्याचे शांतिडोल।

नवमंजरींच्या सौरभें ।।            ।।५।।    

 

भस्मदेह साक्षात्कारला आवाहनें।

मंत्रदेह आकारला संविद्-ध्यानें!

शास्त्रदेह अवतीर्णला प्रज्वालितसंज्ञानें।

त्रिशूल हे आदिस्पर्शाचे!!! ।।          ।।६।।

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