उन्मनी वाङमय

२८ जुलै १९४१

२८ जुलै:

एकूण श्लोक: १२

 

सकाळी १०.४७

 

परिमाणविशेषा: मात्रा:।।१।।

मानानि दर्शन केंद्र निर्णितानि।।२।।

दर्शनं तु कर्माशय स्वरूपितम्।।३।।

कर्माशय: तु संस्कार निर्विशिष्ट:।।४।।

संस्कारा: वासना पार्थक्यात!।।५।।

वासनाग्राम: त्रिवृत्कृत: जीवतत्त्वविशेष:।।६।।

जीवतत्त्वं तु मूल प्राकृतिको संयद्वामविलास:।।७।।

मात्रादर्शनात् साक्षित्वकोटि: ।।८।। ।।‘मात्रादर्शनम्’।।        सकाळी १०.५८

 

सकाळी ११.४९

 

महाजागराचा अभिनव उन्मेष।

महाद्वारींचा प्राथमिक प्रवेश।

महाव्याहृतींचा संयुक्त संदेश।

आज येथ अनुभविणे!!।। ।।९।।    

 

कोटि संस्कारांची भस्मराशी।

अखंडार्थी वृत्ति एक सर्वस्पर्शी ।

ज्योत्स्नाज्योत कीं उदेली अवकाशीं।

लयसाक्षित्वाचें बिंबभान हें  ।।  ।।१०।।    

 

निर्झरलेले महेशपदींचे आशीर्वाद।

संतानलेले दहाराकाशींचे पडसाद।

उत्थापित कुंडलिनीचे फूत्कार नाद।

सद्य:क्षणीं स्वरूपाकारले ।।          ।।११।।    

 

लहरी लहरींत खेळलेला फेस।

वल्लररी वल्लरींत नाचलेला शेष।

शरीरी शरीरीं थिजलेला चितिलेश।

स्फुल्लिंग स्पर्शे जागवूं या   ।।               ।।१२।।

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