उन्मनी वाङमय

ऑगस्ट १९३९

२६ ऑगस्ट:

एकूण श्लोक: ४

 

सकाळी १०.४५

 

विशेषणवत् विशेषांचा संनिकर्ष।

जीव विकासप्रक्रियेचा हेतुपरामर्ष।

कुशलित संयद्वाम भानांचा आवर्ष।

कूटस्थ स्वरूपाचें त्रिदल हें!  ।।      ।।१।।    

 

आकाशगंगेची बिंदुभूतता।

श्यामशून्याची संविद्मूर्तता।

अपराश्रितांची परात्परता।

मंगलावाप्ति कीं गौरस्फूर्तिची! ।।        ।।२।।    

 

सकाळी ११.००

 

मणिमेखला मार्कण्डेय नि:श्वासांची।

अरूण स्मितांनी प्रभातलेली प्राची।

बुद्बुदतारकांनी खुणविणारी व्योमवीची।

अदितिवृत्ति ही मत्स्यालंकृता  ।।    ।।३।।    

सकाळी ११.१०

 

स्वस्ति! अदिते! आद्ये! स्वसंवेद्ये!।

कुशलायतनि! ‘कं’ बीजे! कैवल्यानवद्ये।

काल-कुलमातर् । दिगंबरि! चिर:सद्ये।

नमोऽस्तुते! आदिकल्लोले!अल्लखें!!!।। ।।४।।  

 

सकाळी ११.२५

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