उन्मनी वाङमय

श्लोक ११ ते २०

मध्याह्नी १२.२०

 

संविदुदयाचा प्रथम प्रभात।

प्रकट कीं चिद्भान अनवस्थ।

गंगोत्रलेला श्रीनवनवपंथ।

नमोsस्तुते! ब्रह्मणस्पते!  ।। ।।११।।

 

ध्वनिक्षेपकांनो! श्रीसौभाग्य तुम्हां।

मालाकारांनों! सुगंध आम्हां।

लाथाळुनि कूटस्थाच्या निजधामा।

येथ आमुचा संचार!  ।। ।।१२।।

 

संध्याकाळी ०६.०५

 

लतेस रुजविण्या भूमिकेंत पुन्हा ।

तारकेस अर्पिणें पुन: स्वस्थाना।

श्रोतयास परतविणे उगम निधाना।

जीव संवित् - सुयोग हा  ।। ।।१३।।

 

रहस्यार्थ श्री बीज विद्येचा।

संगम जो चिति संवितिचा।

एकभाव चंद्र पौर्णिमेचा।

पुनर्लब्धि पूर्ण बिंबाची  ।। ।।१४।।

 

दुरंतलेली श्रीसंवित् पौर्णिमा।

हुडकीत चाललो ती श्यामसीमा।

समवीत प्रवृत्ती, ज्या विषमा।

सर्वत्र स्फोटलेल्या  ।। ।।१५।।

 

वृत्ति ग्राव कोटिसंस्कारांचे।

सत्य निकष बुरसटल्या प्रज्ञावंतांचे।

शिक्षाविशेष रुतल्या गुरूगंर्दभांचे।

तोडू, झोडू आणि मोडू!  ।। ।।१६।।

 

अहंकृतिच्या कर्दमांत बरबटलेले।

उष्ट्या अनुभवांत खरकटलेले।

अनुकृतींत सर्वदैव मरकटलेले।

`गुरूगद्धे' हाकलून द्या!  ।। ।।१७।।

 

निरखूं या स्वभावेात्कर्षाचा राजविधी।

पारखूं या स्वानुभवी व्यतिरेक बुद्धी।

साधूंया धृति प्रतिभेच्या संधी।

संधिप्रकाश तो जागर् क्षण!  ।। ।।१८।।

 

संध्याकाळी ०६.३५

 

प्रतिभा ही चित्सूर्याची माध्यान्हकला।

धृति ही जीव विशेषाची स्थैर्यवृत्ति सकला।

सकलांग जागराची जननी चपला।

निमिषसंधि निरखू  हा!  ।। ।।१९।।

 

धृतिधर्म शिकवीत चालला यात्रिक।

महाजागर स्फुटवीत बोलें बम्ह मांत्रिक।

अंधारीं लपलें सूत्रधार कौशिक।

महामांत्रिकाच्या मृत्कला   ।। ।।२०।।

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