उन्मनी वाङमय

श्लोक १ ते १०

सकाळी ०९.५०

 

अल्पांत  ‘भूमा’ चे दर्शन।

परमाणूंत गिरनार संस्थापन।

नेत्र बिंबी आदित्य बिंबाचें उद्गयन।

‘संपत् प्रयोग’ या नाम  ।। ।।१।।

 

व्यष्टितत्त्वींच समष्टितेची संभावना।

स्थूल देशीं महाकारणाची प्रतिष्ठापना।

रेत बिंदूंत वंशसरितेची समर्पणा।

संपत् क्रियेचा विशेष   ।। ।।२।।

 

एक शब्दांत ओतणें चतुर्वाग्भाव।

एक धारेंत निखिल मेघवर्षाव।

एक गुलाबांत सासिन्नला माधव।

संपत् प्रयोग सिद्धि ही!  ।। ।।३।।

 

एक वाक्यांत संपूर्ण सारस्वत।

एक आदेशांत व्यक्तला नवगुह्यहेत।

एक ब्रह्मदेहीं संविदुदय साक्षात्।

संपत् क्रियया  ।। ।।४।।

 

अठ्ठावीस तेजोलवांची संहिता।

अठ्ठावीस स्फुरणांची विद्युल्लता।

अठ्ठावीस अजालोमांची एक कंथा।

संपद् याग हा  ।। ।।५।।

 

सकाळी १०.१५

 

अठ्ठावीस नक्षत्रांची प्रतीकावली।

अठ्ठावीस नसांची मूर्तली अंगुली।

अठ्ठावीस कल्पयुगें संयुक्तलीं पाऊली।

‘संपद् विठ्ठल’ प्रतीक हें!   ।। ।।६।।

 

संपद् विधि हा प्रती कोपासनेचा विशेष।

पदांगुष्ठीं विष्णुतत्त्वाचा समावेश।

दग्धमान कर्पूर लेशांत श्री संवित् प्रकाश।

गौरांगसूर्येचा!  ।। ।।७।।

 

सकाळी १०.३०

 

‘कल्पयुगें’ म्हणजे कालीं कालींचे संकल्पप्रयोग।

संज्ञान - संश्रवणपदीं संपद् भवला जो सुयोग।

स्थूल मृत्तिकेला लाधला त्याचा उपभोग।

एकवटल्या एकविटेला  ।। ।।८।।

 

शुक्लांत कृष्णाचे दर्शन।

जलांत स्थलाचें प्रकटन।

मृत्तिकेंत डोळिवणें सुवर्ण।

आरोपक्रिया ही!     ।। ।।९।।

 

सकाळी १०.३५

 

खडयात भासणे हीरक ।

विकारात वाजविणे विवेक ।

अग्निज्वालेत पयसाभिषेक ।

आरोपक्रिया ही ।। ।।१०।।

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