उन्मनी वाङमय

श्लोक १ ते १०

मध्याह्न १२.००

 

वासना- स्वप्नाचें उपादान कारण।

जीवचिति केन्द्र-निमित्त कारण।।

येथलें वायुद्वय कूर्म उदान।

स्वप्न स्थितीची घटना ऐशी   ।। ।।१।।

 

विशुद्धि चक्रांत याचे स्पंदन ।

षोडश दलांचे जेथ संकलन।।

सुवर्णपुरी द्वारकेचें उत्थान।

एकस्तंभा प्रतीक स्वप्नस्थितीचें  ।। ।।२।।

 

कामसंस्काराचा एक स्तंभ।

तयावरि आधारे स्वप्नविश्व बहुरंग।।

मध्यमा वाणीचा उत्संग।

स्वप्नबाला जेथ पहुडे  ।। ।।३।।

 

स्वप्नमाधवी बहरतां हळुवार।

बोथटते प्रत्यक्षतेची धार।।

स्वाच्छन्द्य्राचा अनिरूद्ध संचार।

संभवे दिक्कालातीत  ।। ।।४।।

 

कालपरिमाण तेथिचें अलौकिक।

आणि स्थलमान मूर्तले कीं नवकौतुक।।

जीवचंडोल उभवी रजतपंख।

स्वैर उडे वासनाव्योम्नीं   ।। ।।५।।

 

प्रतीती येथल्या पदार्थजन्या।

परि पदार्थ, प्रतीतीहूनि न अन्या।

जागृतीचे संस्कारलेश पुन: पूर्णत: प्रत्यविण्या।

कामकामी जीव, स्वप्नस्थ  ।। ।।६।।

 

मध्याह्न १२.२०

 

क्वचित् कदाचित् जीवचेतनेच्या स्वप्नमंदिरीं।

अवधूत अवतरती आदेशशरीरी।।

क्षणैक बहरविती महाचितिची विद्युत् वल्लरी।

वनमाळी हे व्योमवनींचें  ।। ।।७।।

 

विशुद्धि चक्रांत वोपिती सुवर्णस्पर्श।

सूक्ष्म शरीरीं स्पष्टविती महा आदेश।

स्वप्न स्थितींत सन्मुखती लोक-मह-ईश।

गर्भधारणा येथ हेमतत्त्वांची   ।। ।।८।।

 

जागृदवस्थेचें मूल, अबोधगर्भ व्यतिरेक बुद्धि।

स्वप्नस्थितीचें रहस्य जीवा वासनांचा स्वैर संधी।

सुषुिप्त् ही साकारलेली स्वरूप विस्मृति।

व्याहृति या जीवस्वभावाच्या  ।। ।।९।।

 

व्याहृति म्हणजे वागुद्गार।

अवस्था हेच जीवभानाचे रूपाविष्कार।।

अत एव जणुं व्याहृति प्रकार।

असती ते जीवाख्य शब्दाचे  ।। ।।१०।।

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