उन्मनी वाङमय

१४ नोव्हेंबर १९३८

१४ नोव्हेंबर: 

एकूण श्लोक: १८

संध्याकाळी ०६.४२

 

स्वस्ति श्रिये! निष्कले! षोडशांशे।

संवित्तनये, स्फुरत्ते, श्रीविमर्शे।

महाव्योम्नि, महांगुलि, चित्प्रकर्षे।

संकल्प मातर्! नमोsस्तु ते! ।।१।।

 

संध्याकाळी ०६.५०

 

संज्ञक मी आदिष्टलेला ।

चतु:सृष्टींत प्रविष्टलेला ।

संदेश देहीं प्रकटलेला ।

‘दीधीतावधूत’ नाम माझें!  ।। ।।२।।

 

जीव जीव कोशींचा मरकतमणी।

संकल्प भानू विखुरला किरण किरणीं।

शब्दस्पर्शे उगमवीन निर्झरणी।

‘मणि’ तेजाची  ।। ।।३।।

 

संध्याकाळी ०६.५५

 

तेथिंचे रत्नतुषार प्रस्फुरले।

तेथिंचे सुवर्णध्वनि सामगीतले।

तेथिंचे सौरभ पवन व्योमाकारले।

दीधिताचा नित्योत्सव हा  ।। ।।४।।

 

तत्त्व देहास  नका लावूं निकष।

व्योम मूर्तीस नका कल्पूं दिगंश।

रविबिंबा न अर्थवत्ते प्रकाश।

तेजस्तम दृग्निष्ठ  ।। ।।५।।

 

आणाल एक एक जें मापटें।

मोजाल दिक् नवनव्या हस्तपृष्ठें।

शास्त्रविधान हें प्रकटेल थिटें।

निकषातीत सुवर्ण श्री!  ।। ।।६।।

 

प्रमाण प्रमाण होईल निर्माण।

शब्द शब्द पावेल स्तब्धन।

देह देह होईल रजतकण!

कोंदण कीं संविद् रत्नाचें!  ।। ।।७।।

 

फुला फुलास चुंबील श्रीभ्रमरी।

लहरी लहरीस स्पर्शील चंद्रिकेची सरी।

मुक्तेमुक्तेस वेजील मुक्तेश्वरी।

मुक्ती कीं महाजीवनाची!  ।। ।।८।।

 

महाजीवनाच्या सरित् कल्लोलीं।

संविद् भानाच्या सहस्त्रार कमलीं।

सहस्त्र मणिपद्मांच्या तेजोगोली।

समर्पिलें जीवन माझें!  ।। ।।९।।

 

संदेश बुद्बुद् निनादले स्वैर।

चंदेरी पदन्यास फेकिले चौफेर।

उधळिली ऋत् दर्शनांची स्वैर।

जीव जीवाच्या प्रज्ञागर्भीं  ।। ।।१०।।

 

‘शं’ ‘लं’ ‘रं’ हे बीजत्रय।

‘ऍं’ ‘क्लीं’ ‘वषट’ ‘‌ह्रीं’ चतुष्पादन्याय।

जेथ व्यक्तला श्रीविद्याकाय।

नवात्मलेला श्रीनवहेत! ।। ।।११।।

 

कृत्तिकेचे कुशलात्म तेज।

अगस्ति भानाचें एकाधिक शतांश बीज।

अवधूत देहाचें संकल्प-ओज।

महास्फूर्ति ही!  ।। ।।१२।।

 

दीधीतांचा समन्वय।

संज्ञान- विभावनांचा संचय।

विश्वचितिचें भान हिरण्मय।

प्रकटवीन अरुपत:!   ।। ।।१३।।

 

दाखवीन उफराटे शिंपले।

फेकीन बोथटलेले भाले।

चेववीन निरर्थक निष्प्रभ बोलें।

उमगा नव संहिता ही!  ।। ।।१४।।

 

स्मशान मृत्तिकेंत अमृतत्त्व लपवूं।

इंद्रियग्रामांत महाजीवन छपवूं।

जागृतंमन्यास शब्दलीलया ठकवूं।

श्याम पुरीचे ठकसेन आम्ही!  ।। ।।१५।।

 

महाजागराचा क्षणोन्मेष।

देईल माझा शब्दश्रीस्पर्श।

मोकलील कोटिजन्मांचे कारण कोश।

दुग्ध विधान माझें!।। ।।१६।।

 

हेम मात्रेचा एक एक वळसा।

महाद्यूताचा एक एक फासा।

‘ऋत’ कलेचा एक एक ठसा।

उठवीन अभावितपणें!  ।। ।।१७।।

 

संध्याकाळी ०७.४२

 

अवधूत गान जन्मवील श्रुतिशक्ति।

अवधूत दर्शन हें जन्मवील अभिनव दृष्टी।

अवधूत देह हा सजवील नवभूत सृष्टी।

संकल्पशास्त्र हें दत्त - गुह्य!  ।। ।।१८।।

 

आमचा पत्ता

Dr. Samprasad and Dr. Mrs. Rujuta Vinod
Shanti-Mandir, 2100, Sadashiv Peth, Vijayanagar Col.
Behind S. P. college Pune - 411030 

 

दूरध्वनी क्रमांक

+91 90227 10632

 
 
 

ई-मेल आयडी

Search