उन्मनी वाङमय

२६ जुलै १९३९

२६ जुलै 

एकूण श्लोक: ४

 

‘विक्षेप’ हा स्थूलभुक्तत्त्वाचा स्वभाव।

यात निर्यात ‘सूक्ष्मभावा’चा प्रभाव।

संस्पर्शन हंसस्वाचा  शुभ्रोद्भाव।

नियोग म्हणजे श्रीमत्स्वधा!।।          ।।१।।

 

विक्षेपांत वर्तुळें चतुष्कोणतीं।

अनंते सीमाविशेषीं सामावतीं।

विवर्तितें मूलशुक्तिसी रजतवितीं।

छायापाद विक्षेपबिंब ।।            ।।२।।    

 

यात निर्यात हे उभय बिंदू।

सीमवीती ऐंद्रिय प्रत्ययांचा हेलासिंधू।

शबलित परावर्तित स्व स्वानंदू।

उदित-अस्तला निमिषैकीं।।                ।।३।।    

 

क्षीरोदधीची स्वच्छता धवलिमा।

श्रीनाथहंसांची विद्युत्पदपरिक्रमा।

कारणकार्पासस्थ-कर्पूरिता सुषमा।

न्यास हा संस्पर्शन विधीचा!  ।।              ।।४।।  

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