उन्मनी वाङमय

२२ जून १९३९

२२ जून:

एकूण श्लोक: ५

 

संध्याकाळी ०६.४०

 

ऋतंभृता प्रज्ञेचा संगमर्मर।

सायुज्यऐक्याचा स्थिर निर्झर।

‘शं’ बीजांचा सहजस्फूर्त संचार।

स्फटिक कायाचा दीप्तिलेख    ।।        ।।१।।    

 

ऋतांत गुंफिलेलीं सर्वसामान्यें।

प्रतिबिंबलीं स्थिरप्रज्ञेंत प्रत्ययरत्नें।

परिणतलीं सहज भावाचीं सौजन्यें।

स्फटिककाय हा बिंबग्राही ।।            ।।२।।    

 

कुशलित आकांक्षांचें तारामंडळ।

उद्दीपित स्फूर्तींचें सहज कल्लोळ।

संज्ञानित भावांचे झोत विलोल।

बिंबाकारले स्फटिक भूंत ।।              ।।३।।    

 

संध्याकाळी ०७.०८

 

अनंत संचितांचे उत्तुंग प्रासाद।

विस्मृत ऋणानुबंधांचे पडसाद।

पूर्ण प्रकटलेले चौरंगी प्रज्ञापाद।

स्फटिककाय श्रीचौ. भूमिका ।।        ।।४।।    

 

संध्याकाळी ०७.१५

 

विकार, आकार, प्रकार, आविष्कार।

चतुरस्त्रलेला ऋतंभरेचा संसार।

आदिपूजनाचा कर्पूरगौर संभार।

स्फटिककाय ‘शं’ भूतला! ।।          ।।५।। संध्याकाळी ७.२१

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