उन्मनी वाङमय

९ एप्रिल १९३९

९ एप्रिल: 

एकूण श्लोक: १०

 

सकाळी ११.११

 

ऋतं वाचं प्रपद्ये।

मनो यजु: प्रपद्ये।

साम: प्राणं प्रपद्ये।

नमस्वं नमस्वं नमस्वम्।।।।१।।

   

चक्षु: श्रोत्रं प्रपद्ये।

वागोज: समौज:।

मयि प्राणा पानौ।

नम आथर्वणाय ।।          ।।२।।

 

सकाळी ११.४५

   

सप्तपाद माझी गती।

सप्तभान माझी अनुभूती।

सप्तस्वरा माझी सामसंगीती।

सप्तेद्गारा बीजश्री!।।           ।।३।।

   

एक अश्वत्थाच्या सप्तशाखा।

सप्तयात्रिकांची एक नौका।

सप्त् गर्जनांचा एक डंका।

‘बीज वेद हा’! ।। ।।४।।

   

‘वैखरी’ ही स्थूलदर्शी मुद्रा।

वास्तवतेस व्युत्तक्रमविणारी तंद्रा।

व्योम सत्याचा ऊर्ध्वोत्तम पापुद्रा।

पदपदार्थ प्रकाशिनी ।।          ।।५।।

   

अमृतकुंभीं वाढली विषलता।

मदोन्मत्तली वा सात्त्विका राजसत्ता।

महावस्त्रश्रीची विद्रुपलेली कंथा।

वैखरी ही विकृतवाक्! ।।          ।।६।।

   

शिवस्थानाजवळींचें स्मशान।

गंगातीरीचा विष्ठापाषाण।

श्रुतिसामापुढची कीं गर्दभी तान।

विरूपाक्षा ही वैखरी।।            ।।७।।

 

मध्याह्न १२.१२

 

मणिदर्पणाचा मोडला आकार।

कुपुत्रिकांचा ओसाडला संसार।

सुवर्ण इष्टिकांचा कोसळला प्राकार।

त्या नांव वैखरी ।।              ।।८।।

   

वाक्य जणुं शब्द सोडलेलें।

मण्डप कीं स्तंभ मोडलेले।

गीत वा स्वर खोडलेलें।

या नांव ‘वैखरी’।।                ।।९।।

   

कंटकास काढणारा कंटक!।

सत्त्यास स्पष्टविणारी साक्षवंचक।

स्थूलास आदेशणारा विखारी डंख।

या नांव वैखरी ।।        ।।१०।।

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