उन्मनी वाङमय

११ फेब्रुवारी १९३९

११ फेब्रुवारी:

एकूण श्लोक: १५

 

संध्याकाळी ०६.१२

 

समुद्र कीं श्रीमौक्तिक जलांचा।

सूर्य कीं सु-वर्ण बीज तेजांचा।

प्राकार वा कुशलित - कारणेष्टिकांचा।

नादरूपला तेजोगोल  ।।      ।।१।।

   

विनियोग हें बीजगर्भाधान।

‘संविद रं’चें उदगयन।

अथर्वणाचें निष्पादन।

सामसंस्थापनीं ।।        ।।२।।    

 

संध्याकाळी ०६.२८

 

मिटल्या पाकळयांत ओळखा गंधमादन।

सुषुप्तींत चाखा निरवस्थान।

वृत्तिदर्पणीं कवडसलेला आत्मकिरण।

डोळवा कुशलदृशा!  ।।        ।।३।।    

 

संध्याकाळी ०६.२९

 

घनवटल्या शून्यांचा गिरनार।

निरालंब - पाउकांचा विद्युत्संचार!।

तेजाळल्या क्षितिजांचा उभार।

बीजगुहेभोंवती या!! ।।        ।।४।।    

 

संध्याकाळी ०६.३४

 

चाल पाउलवाट गुलाबकळयांची।

माळ मौक्तिकें श्रीसंवित्तळींचीं।

पाळ व्रतें हीं अवधूतकुळींचीं।

असिधारागत  नृत्य  हें!          ।।५।।    

 

बोल हा क्षरीं अक्षरलेला।

गोल हा त्रिबिंदूंत परिघलेला।

डोल हा त्रिशीर्षीं आनंदलेला!

प्रभात नवनिकायाचा!  ।।          ।।६।।    

 

संध्याकाळी ०६.५२

 

सप्तसिंधूंनीं आलिंगिलेली।

सप्तद्रष्टारांनीं न्याहाळलेली।

सप्त उत्संगांनीं सांभाळलेली।

बीजबाला ही पुष्पिता!  ।।          ।।७।।    

 

संध्याकाळी ०६.५८

 

बीजपल्लवीचा मेळवा अन्वय।

सुवर्णस्पंदांचें रूपवा वलय।

क्षरावस्थांचा संपूर्णवा प्रलय।

आदरा हा कलशाशीर्वाद! ।।        ।।८।।

 

संध्याकाळी ०७.१७

 

लता ही रूजेल वनावनांत।

स्फूर्ति ही स्फुरेल मनामनांत। 

विद्या ही खुलेल जनाजनांत।

‘अन्नदा’ श्रीभास्वरा!           ।।९।।

   

देहादेहास करू सालंकृत।

गूढा गूढास करू आविष्कृत।

मूढा मूढास अन् शुक्लाध्यस्त।

संवित् शलाकेनें! ।।            ।।१०।।

 

संध्याकाळी ०७.३२

   

लहरी लहरीवरी दाखवूं तळमौक्तिकें।

शीर्षशीर्ष सिंचवूं आशीर् अभिषेकें।

जीवजीव सुखवूं सोंलीव सुखें।

कैवल्यस्पर्श हा प्रबोधक! ।।           ।।११।।

   

हस्ताहस्तांत अर्पूं श्रीफल!।

कंठाकंठांत वोपूं कैवल्यजल!  ।

वक्षीं वक्षीं स्थापूं सौभाग्य श्रियाळ!।

संकल्पावधूत कार्य हे! ।।      ।।१२।।

   

नेत्रानेत्राशीं भिडवूं सूर्यबिंब!।

गात्रागात्रासी कल्पवूं चंद्रिकासंग।

श्रोत्राश्रोत्रास श्राववूं आदेश अभंग।

अलखपुरीचे ‘श्रीमंत’ आम्ही!।।        ।।१३।।

   

गृहागृहांत पेटवू महादीप।

भ्रष्टाभ्रष्टास ऐकवूं उ:शाप!।

शवाशवावरी महाचैतन्याचा अध्यारोप।

करीत राहूं संकर्मवेत्ते।।          ।।१४।।

 

अणूं-अणूंत प्रसूतवूं चितिकोर।

बिंदू बिंदूंत प्रकटवूं मत्स्य विद्यासागर।

लोमलोमीं उमटवूं श्रीसंवित्संस्कार।

सहजा ही आमुची प्रवृत्ती!  ।।          ।।१५।।

 

संध्याकाळी ०८.०८

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