उन्मनी वाङमय

२२ जानेवारी १९३९

२२ जानेवारी:

एकूण श्लोक: ८

 

संध्याकाळी ०६.३६

 

ज्योति-जान्हवी जटगुहेंत झरलेली।

शब्दश्री त्रिकूटांत स्थिरलेली।

तत्त्वमूर्ति चतु:श्रेणींत विखुरलेली।

ऋद्धि गीति ही आदिबीजा! ।।                ।।१।।    

 

संस्कारांची सहजसंगति।

विकृतींची विलक्षणा व्युत्क्रांति।

परौन्मुख प्रवृत्तींची परिणति।

बीजाक्षरी ही रंस्विनी! ।।              ।।२।।    

 

संध्याकाळी ०६.५६

 

क्षरांत ‘कं’ ‘शं’ ‘रं’ मुहूर्तभोग।

अक्षरांत एकाधिकाराचा सदातनयोग।

संवित्तेंत षड्बीजांचा विनियोग।

सुसूक्ष्मपीठीं सुव्याकृत!  ।।        ।।३।।    

 

संध्याकाळी ०७.०२

 

अक्षररेत क्षरबीजगर्भीं।

अनंता आकृति दृग्-दत्त नभीं।

आत्मानंद कीं संनिकृष्ट विषयेंद्रिय संयोगीं।

ऋक्शक्तीचा महान्यास हा!।। ।।४।।    

 

जडाजड भानांची अंत:स्थिति।

विश्ववालुकेंत पीं अंतर्हितली श्रीसरस्वति।

नैष्कर्म्यसिद्धांत प्रवर्तली संकर्मतति।

गर्भबीजा ही विद्या  ।।        ।।५।।    

 

संध्याकाळी ०७.१५

 

चतुर्देह ही वाङ्मूर्ती चतुष्पदा।

चतुष्कोण कीं चौरंगलेली बीजसंपदा।

संविन्नेपथ्यीं नटली कीं अन्नदा।

महानुभाव नि:स्यंदिनी!  ।।            ।।६।।    

 

संध्याकाळी ०७.१९

 

मूलचितिचा कीं महोन्मेष।

मूलप्रकृतिचा पुरूषांत अंत:प्रवेश।

बीजेश्वराचा कीं निर्देह आश्लेष।

मत्स्यमंत्रांत मूर्तलेला!  ।।            ।।७।।    

 

संध्याकाळी ०७.३०

 

बीजामृतक्षीराची ही ओलींव।

निजनिजसत्तेची स्थिति कीं सोलीव।

वृत्तिज्ञतेची अनुभूतली फोलीव।

‘बीजश्री’ भान हें!  ।।                ।।८।।

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